The Leaflet

| @theleaflet_in | June 26,2020

“We hope that you feel and imagine that exhilarating moment of democratic power through a reading of this riveting poem. “

 

On June 25, 1975, Jay Prakash Narayan called for a ‘total revolution’ from the grounds of Ramlila Maidan in Delhi.  During his call for ‘total revolution’, JP read a poem, a legendary poem that became a symbol of the power of people in Indian democracy.

Written by noted Hindi poet, Ramdhari Singh Dinkar, this poem titled ‘Singhasan Khali Karo ki janata aati hai’ was a thunderous reminder that in a democracy ultimate power lies with the people, the masses. It is in the aftermath of this call that Mrs. Indira Gandhi declared Emergency, thereby ushering in an era of rampant human rights abuse and abrogation of rule of law.

Also Read: Remembering the Emergency 1975

 

“a thunderous reminder that in a democracy ultimate power lies with the people”

 

While today we all remember the Emergency for its excesses, it is also important to remember its underlying lesson on the power of “We the People”. We hope that you feel and imagine that exhilarating moment of democratic power through a reading, by Mr Kaizad S Gandhi, of this riveting poem.

Also Read: Emergency: A half-learnt lesson

 

Also Read: Close shave in August 1975

Also Read: Are We Condemned To Repeat History?

Here is the full text of the poem

 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,

जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,

जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे

तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहने  वाली।

जनता?हां,लंबी – बडी जीभ की वही कसम,

“जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।” ”

सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?”

‘है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?”

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,

जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;

अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के

जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,

सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?

वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार बीता;

गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं; यह और नहीं कोई,

जनता के स्वप्न अजय चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,

तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो

अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,

तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है

मूरख, मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?

देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,

देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,

धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;

दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

 

Source:  https://www.gaonconnection.com/books-poems-book-review-interviews-shayri-famous-letters-hindi-literature/5-poems-of-rashtrakavi-ramdhari-singh-dinkar-on-his-birthday-23rd-september

 

Also Read: How to Declare a National Emergency

Also Read: The Judge who unseated a Prime Minister

Leave a Comment